New Delhi : भारत निर्वाचन आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के दौरान मतदाता सूची की गड़बड़ियों को चिन्हित करने के लिए इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर का विवरण सार्वजनिक करने से मना कर दिया है।
(RTI) के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में चुनाव आयोग ने कहा कि यह सॉफ्टवेयर बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) और ‘ट्रेड सीक्रेट’ के दायरे में आता है, जिसे RTI कानून की धारा 8(1)(d) के तहत उजागर नहीं किया जा सकता। आयोग ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि मतदाता सूचियों की जांच में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग या प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग हुआ था या नहीं। नाम जोड़ने या हटाने में सॉफ्टवेयर की भूमिका पर आयोग ने स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13B के तहत मतदाता सूची तैयार करने और संशोधित करने का अंतिम अधिकार और कानूनी जिम्मेदारी केवल संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) की ही होती है।
प्रौद्योगिकी की पारदर्शिता पर बने इस रहस्य के बीच चुनाव आयोग के भीतर प्रशासनिक तनातनी की बात भी सामने आई है। RTI कार्यकर्ता कमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश के. बत्रा द्वारा प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को पत्र लिखकर उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज पर सवाल उठाए थे। दोनों आयुक्तों ने आरोप लगाया कि गर्ग ने आयोग की सहमति के बिना वरिष्ठ अधिकारियों के कार्य आवंटन में बदलाव के आदेश दिए थे।
कैबिनेट सचिवालय ने मामले की समीक्षा के बाद निर्णय लिया कि व्यक्तिगत स्तर पर लिखे गए इन पत्रों पर कार्यकारी कार्रवाई करना एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के आंतरिक कामकाज में दखल के समान हो सकता है। इसके बाद सचिवालय ने इन शिकायतों को अग्रिम रिकॉर्ड और जानकारी के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय तथा कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेज दिया।




























































