1975 की वो रात फिर याद आई! क्या भारत में दोबारा लग सकता है इमरजेंसी? बदले हुए नियमों की पूरी कहानी

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Emergency in India

Emergency in India: 25 जून 1975 की आधी रात को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास ने ऐसा मोड़ लिया, जिसे आज भी देश के सबसे विवादित अध्यायों में गिना जाता है. उस रात सत्ता के गलियारों में लिए गए एक फैसले ने करोड़ों भारतीयों की आजादी, अभिव्यक्ति और संवैधानिक अधिकारों को गहरे असर में डाल दिया.(Emergency in India) अगले दिन, 26 जून की सुबह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रेडियो पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए बताया कि देश में आपातकाल लागू कर दिया गया है और घबराने की कोई जरूरत नहीं है.

दरअसल, 25 जून की रात तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल की घोषणा की थी. इसके बाद केंद्र सरकार को असाधारण शक्तियां मिल गईं, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई और नागरिक स्वतंत्रताओं पर कई तरह की पाबंदियां लागू कर दी गईं.

आपातकाल का यह दौर करीब 21 महीने तक चला और भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक माना जाता है. यही वजह है कि लगभग पांच दशक बाद भी यह सवाल समय-समय पर उठता है कि क्या देश में फिर कभी ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है, जब सत्ता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संतुलन चुनौती के दौर से गुजरे.

1971 के लोकसभा चुनाव को अवैध घोषित

12 जून 1975 का दिन इंदिरा गांधी के लिए कई झटके लेकर आया (Indira Gandhi Emergency History). सुबह उनके करीबी सहयोगी डी.पी. धर का निधन हो गया. इसके कुछ ही घंटों बाद गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस को बड़ा राजनीतिक झटका दिया. लेकिन सबसे बड़ा संकट शाम को आया, जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली से उनके 1971 के लोकसभा चुनाव को अवैध घोषित कर दिया. अदालत ने माना कि चुनाव प्रचार के दौरान सरकारी अधिकारियों और संसाधनों का इस्तेमाल किया गया था. साथ ही, उनके सहयोगी यशपाल कपूर ने सरकारी पद पर रहते हुए चुनावी गतिविधियों में भूमिका निभाई थी. कोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द करते हुए उन्हें छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया, हालांकि सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के लिए 20 दिन का समय दिया गया.

24 जून को सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें केवल आंशिक राहत मिली. वह प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं, लेकिन सांसद के अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर सकती थीं. इस फैसले के बाद विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग तेज कर दी और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में देशभर में आंदोलन शुरू हो गया. इसी राजनीतिक संकट के बीच 25 जून 1975 की रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया (1975 emergency history). इसके बाद प्रेस पर सेंसरशिप लग गई, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और नागरिक अधिकारों पर कई पाबंदियां लगा दी गईं. करीब 21 महीने बाद 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ. इसके बाद हुए आम चुनाव में कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी और इंदिरा गांधी रायबरेली से राजनारायण के हाथों चुनाव हार गईं. यह भारतीय राजनीति का एक ऐतिहासिक मोड़ था, जिसने लोकतंत्र और सत्ता के रिश्ते पर गहरी छाप छोड़ी.

 44वां संविधान संशोधन लाया

आपातकाल का अध्याय 1977 में खत्म जरूर हुआ, लेकिन उसके बाद बनी जनता पार्टी सरकार ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि भविष्य में किसी सरकार के लिए इतनी व्यापक शक्तियों का इस्तेमाल करना आसान न रहे. इसी उद्देश्य से 44वां संविधान संशोधन लाया गया (44th Constitutional Amendment India), जिसने आपातकाल से जुड़े कई नियमों को और सख्त बना दिया (India Emergency Rules). इसके तहत राष्ट्रपति तब तक राष्ट्रीय आपातकाल घोषित नहीं कर सकते, जब तक केंद्रीय मंत्रिमंडल लिखित रूप में इसकी सिफारिश न करे. साथ ही, संविधान में मौजूद ‘आंतरिक अशांति’ शब्द को हटाकर उसकी जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’ कर दिया गया, ताकि इस प्रावधान का मनमाने ढंग से इस्तेमाल न हो सके.

संशोधन के बाद यह भी तय किया गया कि आपातकाल की घोषणा को एक महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिलना जरूरी होगा. मंजूरी मिलने के बाद भी इसकी अवधि केवल छह महीने तक ही रहेगी और आगे बढ़ाने के लिए हर बार संसद की स्वीकृति लेनी होगी. इन बदलावों का मकसद लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना और सत्ता के केंद्रीकरण पर अंकुश लगाना था.

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