Chinese Manja: राज्य सरकारें हर साल साफ़-साफ़ आदेश जारी करती हैं—चाइनीज़ मांझा पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद सच्चाई यह है कि यह जानलेवा मांझा सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर खुलेआम बिक रहा है। फेसबुक मार्केटप्लेस, व्हाट्सएप ग्रुप और ई-कॉमर्स जैसे माध्यमों पर “Mono Fighter”, “Original Manja” जैसे नामों से इसकी बिक्री निर्बाध जारी है। सवाल उठता है (Chinese Manja)क्या क़ानून सिर्फ़ फाइलों और नोटिफिकेशन तक सीमित रह गया है?
ऑनलाइन बाज़ार: मौत का सामान एक क्लिक दूर
तस्वीरें, कीमत और सीधा “Send Seller a Message”—इतना आसान है चाइनीज़ मांझा खरीदना। ₹400–₹500 में उपलब्ध यह मांझा बच्चों, बाइक सवारों और पक्षियों के लिए जानलेवा साबित हो चुका है। हर मकर संक्रांति के बाद अस्पतालों में कटे गले, जख्मी हाथ और घायल पक्षियों की खबरें आती हैं, लेकिन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर न तो निगरानी है, न जवाबदेही।
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प्रशासन ऑफलाइन, हादसे ऑनलाइन
पुलिस और नगर निगम की कार्रवाई अक्सर त्योहारों तक सीमित रहती है—कहीं-कहीं छापे, कुछ रील्स, कुछ जब्ती। इसके बाद सब सामान्य। ऑनलाइन विक्रेता न तो लाइसेंस दिखाते हैं, न पहचान। प्रशासन की साइबर मॉनिटरिंग कहाँ है? जिन प्लेटफॉर्म्स पर यह बिक्री हो रही है, उन्हें नोटिस क्यों नहीं? क्या हादसों का इंतज़ार कार्रवाई की शर्त है?
क़ानून क्या कहता है, ज़मीन पर क्या होता है
कई राज्यों में चाइनीज़ मांझा रखने, बेचने और इस्तेमाल पर सख़्त सज़ा का प्रावधान है—जुर्माना और जेल दोनों। बावजूद इसके, न तो एफआईआर की संख्या डर पैदा करती है, न सज़ा की मिसाल। नतीजा—विक्रेता बेखौफ, खरीदार बेपरवाह।
पीड़ित कौन? जवाबदेह कौन?
कटे गले के साथ अस्पताल पहुँचता बाइक सवार, पेड़ों पर उलझकर तड़पता पक्षी, और हादसे का गवाह बनता परिवार—सब पीड़ित हैं। जवाबदेह कौन? विक्रेता, प्लेटफॉर्म या प्रशासन? जब सबकी जिम्मेदारी तय नहीं, तब हादसे तय हैं।
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समाधान क्या है—अब नहीं तो कब?
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की तत्काल पहचान कर बिक्री रोकना, साइबर सेल से 24×7 निगरानी, कड़ी एफआईआर, सार्वजनिक नामजद कार्रवाई, और जागरूकता—ये सब आज की ज़रूरत हैं। वरना अगली हेडलाइन फिर वही होगी—“एक और जान, एक और लापरवाही।”


































































