India New Currency:भारत में डिजिटल पेमेंट का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद नकदी की जरूरत कम होने का नाम नहीं ले रही। यही वजह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब पारंपरिक कागजी नोटों की जगह पॉलिमर यानी प्लास्टिक के नोटों को चलन में लाने की संभावना पर गंभीरता से विचार कर रहा है। अगर यह योजना आगे बढ़ती है तो आने वाले समय में लोगों के(India New Currency) हाथ में प्लास्टिक से बने नोट दिखाई दे सकते हैं।
हालांकि, यह विचार पूरी तरह नया नहीं है। इससे पहले साल 2012 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के दौरान भी पॉलिमर बैंक नोट्स पर चर्चा हुई थी, लेकिन वह योजना आगे नहीं बढ़ पाई। अब एक बार फिर RBI इस विकल्प को लेकर सक्रिय नजर आ रहा है।
RBI की बैठकों में उठा मुद्दा
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, RBI की हालिया बोर्ड बैठकों में पॉलिमर नोटों को लेकर विस्तार से चर्चा हुई है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि कागजी नोटों की छपाई पर लगातार बढ़ते खर्च और उनकी कम लाइफ को देखते हुए अब टिकाऊ विकल्प तलाशना जरूरी हो गया है।
पॉलिमर नोट लंबे समय तक चलते हैं और जल्दी खराब नहीं होते। ऐसे में शुरुआती लागत ज्यादा होने के बावजूद लंबे समय में इनसे खर्च कम किया जा सकता है।
नोट छापने की लागत में बड़ा उछाल
RBI की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में नोटों की छपाई पर करीब 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए। इससे पिछले वित्त वर्ष में यह खर्च 5,101.4 करोड़ रुपये था। यानी सिर्फ एक साल में ही नोट छापने की लागत में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
इसी बढ़ती लागत ने RBI को नए विकल्पों पर विचार करने के लिए मजबूर किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि पॉलिमर नोट ज्यादा टिकाऊ होने के कारण लंबे समय में आर्थिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकते हैं।
खराब और फटे नोट बड़ी चुनौती
देश में हर साल बड़ी संख्या में पुराने, गंदे और फटे नोटों को चलन से बाहर करना पड़ता है। वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 23.8 अरब खराब नोट नष्ट किए गए, जो पिछले साल की तुलना में 12.3 प्रतिशत ज्यादा हैं।
इनमें सबसे ज्यादा 500 रुपये और 100 रुपये के नोट शामिल रहे। एक्सपर्ट्स का कहना है कि प्लास्टिक के नोट कागज के मुकाबले ज्यादा मजबूत होते हैं और नमी, धूल तथा बार-बार इस्तेमाल से जल्दी खराब नहीं होते।
डिजिटल पेमेंट बढ़ा
भारत में UPI और डिजिटल ट्रांजैक्शन लगातार नए रिकॉर्ड बना रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद नकदी की मांग तेजी से बढ़ रही है। 15 मई तक देश में चलन में मौजूद कुल नकदी 42.86 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई।
सिर्फ वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती डेढ़ महीने में ही नकदी में 1.15 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह साफ संकेत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कैश की भूमिका अभी भी बेहद महत्वपूर्ण बनी हुई है।
छोटे नोटों की मांग बनी चुनौती
RBI के सामने छोटे मूल्य वर्ग के नोटों की उपलब्धता भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। 10 और 20 रुपये के नोटों की मांग लगातार बनी हुई है, लेकिन कुल मुद्रा मूल्य में इनकी हिस्सेदारी बेहद कम है।
10 रुपये के नोट की हिस्सेदारी करीब 0.7 फीसदी और 20 रुपये के नोट की लगभग 0.8 फीसदी रही। छोटे लेनदेन के लिए RBI ने सिक्कों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद आम लोगों के बीच नोटों की मांग कम नहीं हो सकी।
बदल सकती है भारतीय करेंसी की तस्वीर
अगर RBI की यह योजना सफल होती है तो आने वाले वर्षों में भारतीय करेंसी की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। पॉलिमर नोट न सिर्फ ज्यादा टिकाऊ होंगे, बल्कि नकली नोटों पर रोक लगाने में भी मददगार साबित हो सकते हैं। अब सभी की नजर RBI के अगले कदम पर टिकी हुई है।




































































