20 साल की दूरी खत्म! राज-उद्धव की जोड़ी ने BMC चुनाव से पहले महाराष्ट्र की राजनीति हिला दी!

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Indian Politics News: लगभग दो दशक तक अलग-अलग राह पर चलने के बाद आखिरकार राज ठाकरे (MNS) और उद्धव ठाकरे (Shiv Sena UBT) फिर से एक साथ आ गए हैं। यह सिर्फ दो चचेरे भाइयों का मिलन नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ी हलचल का संकेत माना जा रहा है।

दोनों नेताओं ने साफ कहा—“हम साथ रहने के लिए साथ आए हैं”—और इसके साथ ही ऐलान किया कि बीएमसी चुनाव दोनों पार्टियां मिलकर लड़ेंगी।

BMC चुनाव में पलट सकती है बाजी

अगर यह गठबंधन जमीनी स्तर पर सही तरीके से उतरता है, तो बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव का पूरा समीकरण बदल सकता है। पिछले करीब तीन दशकों से शिवसेना (अब UBT) का BMC पर दबदबा रहा है, लेकिन हालिया निकाय चुनाव नतीजों से संकेत मिल रहे थे कि यह पकड़ कमजोर हो रही है। ऐसे में ठाकरे ब्रदर्स का एक साथ आना राजनीतिक बाजी को फिर से पलटने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

अब और दिलचस्प होगा BMC का रण

BMC चुनाव अब इसलिए भी बेहद दिलचस्प हो गया है क्योंकि ठाकरे ब्रदर्स के सामने BJP, एकनाथ शिंदे और अजित पवार का शक्तिशाली ‘महायुति’ गठबंधन खड़ा है। मुंबई की सत्ता की यह लड़ाई केवल नगर निगम की नहीं, बल्कि मराठी अस्मिता और राजनीतिक विरासत की भी बन चुकी है।

राज और उद्धव अलग क्यों हुए थे?

साल 2005-06 में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के उत्तराधिकार को लेकर दोनों भाइयों के बीच दरार पड़ी थी। जब बाल ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया, तो राज ठाकरे नाराज हो गए।

इसके बाद राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) का गठन किया। यह दूरी सिर्फ राजनीतिक नहीं थी, बल्कि दोनों के बीच व्यक्तिगत रिश्तों में भी खटास आ गई थी।

अब दोबारा साथ आने की वजह क्या?

करीब 20 साल बाद दोनों का साथ आना केवल भावनात्मक फैसला नहीं, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक मजबूरी और अस्तित्व की लड़ाई भी साफ दिखती है।

एकनाथ शिंदे के विद्रोह के बाद शिवसेना (UBT) न सिर्फ सत्ता से बाहर हुई, बल्कि पार्टी का चुनाव चिह्न भी खो बैठी। वहीं, MNS की पकड़ भी पिछले कई चुनावों में कमजोर होती नजर आई।

हालिया निकाय चुनावों में शिवसेना (UBT) को केवल आठ सीटें मिलीं, जबकि राज ठाकरे की पार्टी का खाता तक नहीं खुल पाया। दोनों जानते हैं कि अलग-अलग लड़ने पर मराठी वोट बंटता है, जिसका सीधा फायदा BJP या शिंदे गुट को मिलता है।

शिंदे की ‘बाल ठाकरे विरासत’ की दावेदारी पर असर

राज और उद्धव का साथ आना एकनाथ शिंदे की उस रणनीति को भी कमजोर कर सकता है, जिसमें वे खुद को बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत का असली उत्तराधिकारी बताते रहे हैं। ठाकरे परिवार का एकजुट होना इस नैरेटिव को चुनौती देता है।

ठाकरे ब्रदर्स के साथ आने से सत्ताधारी महायुति के सामने कई नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। अब तक राज ठाकरे को अक्सर ‘वोट कटवा’ माना जाता था, जिससे शिवसेना (UBT) को नुकसान और BJP-शिंदे को फायदा होता था।

अब यह वोट बैंक एकजुट हो सकता है। एकनाथ शिंदे की ताकत माने जाने वाले ठाणे-मुंबई बेल्ट और जमीनी कार्यकर्ताओं पर भी इसका असर पड़ सकता है। ठाकरे ब्रदर्स अपने पुराने समर्थकों को फिर से जोड़ने की कोशिश कर सकते हैं।

साफ संकेत—लड़ाई अब विरासत और अस्तित्व की

राज और उद्धव ठाकरे का साथ आना बताता है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब नई करवट ले रही है। BMC चुनाव सिर्फ नगर निगम का चुनाव नहीं, बल्कि ठाकरे बनाम महायुति की प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है।

अब सबकी नजर इस बात पर है कि यह गठबंधन जमीन पर कितना मजबूत उतरता है—और क्या ठाकरे ब्रदर्स वाकई मुंबई की सत्ता में वापसी कर पाएंगे?

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