Bhajanlal Government: जयपुर। राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर राजभवन और पुरानी सरकार के फैसले आमने-सामने आ गए हैं। विधानसभा के बजट सत्र के पहले ही दिन राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने अशोक गहलोत सरकार का वह अहम बिल वापस लौटा दिया, जिसे समाज में ‘इज्जत के नाम पर हत्या’ जैसी कुप्रथा को खत्म करने के लिए लाया गया था।
इस फैसले ने न सिर्फ सदन का माहौल गर्म किया है, बल्कि उन परिवारों और जोड़ों के बीच भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जो आज भी सामाजिक दबाव और (Bhajanlal Government)धमकियों के बीच जीने को मजबूर हैं।
राज्यपाल ने क्यों लौटाया ऑनर किलिंग बिल?
सरकार की ओर से दलील दी गई कि जब यह बिल 2019 में पास हुआ था, तब देश में IPC और CrPC लागू थे। अब उनकी जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 ने ले ली है।
सरकार का मानना है कि BNS की धारा 103 हत्या जैसे जघन्य अपराधों से निपटने के लिए पूरी तरह सक्षम है। इस धारा में दोषी को मौत की सजा या आजीवन कारावास का स्पष्ट प्रावधान है, ऐसे में अलग से राज्य कानून की जरूरत नहीं बचती।
गहलोत सरकार क्या बदलना चाहती थी?
साल 2017 के पहलू खान प्रकरण और देशभर में बढ़ती भीड़ हिंसा की घटनाओं के बाद गहलोत सरकार ने एक कड़ा संदेश देने की कोशिश की थी। उद्देश्य साफ था—
- अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों की सुरक्षा
- खुद को समाज का ठेकेदार बताने वाली खाप पंचायतों पर लगाम
- धमकी, बहिष्कार और हिंसा को अपराध की श्रेणी में लाना
बिल में दोषियों के लिए प्राकृतिक जीवन के अंत तक कारावास और 5 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान था, ताकि डर नहीं बल्कि कानून का खौफ पैदा हो।
सिर्फ कानून नहीं, भरोसे का सवाल
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह केवल कानूनी तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के भरोसे से जुड़ा मामला है। सवाल यह है कि क्या केंद्रीय कानून जमीन पर उतना ही असरदार साबित होंगे, जितना राज्य स्तर पर बनाए गए विशेष कानून?
पुराने बिल, नया रुख
यह पहला मौका नहीं है जब पुरानी सरकारों के बिल राजभवन से लौटे हों। इससे पहले भी—
- मॉब लिंचिंग बिल, 2019
- तीन कृषि कानून
- वसुंधरा राजे सरकार का धर्म की स्वतंत्रता विधेयक
वापस भेजे जा चुके हैं। वहीं, मौजूदा भजनलाल सरकार ने हाल ही में राजस्थान गैरकानूनी धर्म परिवर्तन निषेध विधेयक, 2025 पारित कर यह संकेत दे दिया है कि अब राज्य की प्राथमिकताएं बदली हुई हैं।
सवाल बरकरार है…
क्या सिर्फ कड़े प्रावधान ही काफी हैं या पीड़ितों को यह भरोसा भी चाहिए कि कानून उनके साथ खड़ा है? राजस्थान में ऑनर किलिंग बिल की वापसी ने यही सवाल एक बार फिर समाज और सत्ता के सामने खड़ा कर दिया है।

































































