ट्रंप ने ट्रेड डील बताई, चीन ने ताइवान की रेड लाइन दिखाई, फोन कॉल में क्या हुआ था?

25
international Politics

International Politics : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। ट्रंप का अंदाज़ वही पुराना—पहले ऐलान, बाद में तथ्य। लेकिन इस बार मामला सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चीन ने सीधे तौर पर ट्रंप के दावों को खारिज कर दिया है। सवाल अब ये है—क्या ट्रंप ने बातचीत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया या (International Politics )फिर यह एक सोची-समझी राजनीतिक चाल थी?

4 फरवरी को डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से लंबी और बेहद सकारात्मक फोन बातचीत की है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर लिखा कि इस बातचीत में चीन द्वारा अमेरिकी कृषि उत्पादों, ऊर्जा, तेल-गैस और विमानन से जुड़े बड़े सौदों पर सहमति बनी है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

चीन ने ट्रंप के दावों को क्यों किया दरकिनार?

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने जब इस बातचीत को लेकर अपनी आधिकारिक रिपोर्ट जारी की, तो उसमें ट्रंप द्वारा बताए गए अधिकांश मुद्दों का कोई जिक्र ही नहीं था। न सोयाबीन खरीद की बात, न एयरक्राफ्ट डील और न ही ऊर्जा समझौते।

शिन्हुआ के मुताबिक, बातचीत का फोकस पूरी तरह ताइवान मुद्दे पर रहा। रिपोर्ट में साफ कहा गया कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिका को चेतावनी दी कि ताइवान चीन का आंतरिक मामला है और इसमें किसी भी तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

ताइवान बना बातचीत का असली केंद्र

चीन की ओर से जारी बयान यह संकेत देता है कि इस फोन कॉल में शी जिनपिंग का रुख आक्रामक और स्पष्ट था। उन्होंने अमेरिका को ताइवान को हथियार बेचने पर संयम बरतने की सलाह दी और इसे चीन की “रेड लाइन” बताया।

यानी, जहां ट्रंप इसे आर्थिक समझौतों की बड़ी जीत के तौर पर पेश कर रहे थे, वहीं चीन इसे अपनी रणनीतिक चेतावनी के रूप में देख रहा था।

क्या ट्रंप ने फिर से बढ़ा-चढ़ाकर पेश की हकीकत?

यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने किसी अंतरराष्ट्रीय बातचीत के बाद ऐसे दावे किए हों, जिनकी पुष्टि संबंधित देश ने नहीं की। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बातचीत को लेकर भी ट्रंप के बयानों और वास्तविक तथ्यों में अंतर देखा गया था।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप अक्सर घरेलू राजनीति और अपनी छवि को मजबूत करने के लिए प्री-एम्प्टिव पोस्ट का सहारा लेते हैं—भले ही ज़मीनी सच्चाई कुछ और ही क्यों न हो।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वैश्विक कूटनीति में सोशल मीडिया घोषणाओं की विश्वसनीयता कितनी है। ट्रंप की पोस्ट जहां आत्मविश्वास से भरी दिखती है, वहीं चीन की चुप्पी और आधिकारिक बयान एक बिल्कुल अलग कहानी बयान करते हैं। साफ है—इस बातचीत में जीत किसकी हुई, यह तय करना इतना आसान नहीं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here