BJP News: चित्तौड़गढ़। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के चित्तौड़गढ़ संगठन में चल रही अंदरूनी खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही है। मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति के बाद से ही पार्टी दो धड़ों में बंटी नजर आ रही है। असंतुष्ट नेताओं ने 29 जनवरी तक का अल्टीमेटम दिया था, लेकिन प्रदेश नेतृत्व (BJP News) की चुप्पी ने आग में घी डालने का काम किया है।
दो खेमों में बंटी बीजेपी
एक तरफ विधायक चन्द्रभान सिंह आक्या और भाजपा जिलाध्यक्ष रतन लाल गाडरी का समर्थक खेमा है, तो दूसरी ओर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और सांसद सीपी जोशी के समर्थक खुलकर विरोध में उतर आए हैं। अब तक इस मुद्दे को लेकर 3 से 4 अहम बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन समाधान दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा।
विवाद की असली वजह 6 मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति बताई जा रही है। सीपी जोशी गुट का आरोप है कि तय मापदंडों को नजरअंदाज करते हुए 6 में से 5 मंडल अध्यक्ष चन्द्रभान गुट से जुड़े लोगों को बनाए गए हैं। इससे पार्टी के अंदर असंतोष गहराता चला गया।
जिलाध्यक्ष ने भेजे थे नाम, दिल्ली तक पहुंचा मामला
अब सामने आई नई जानकारी ने सियासी पारा और चढ़ा दिया है। सूत्रों के मुताबिक, मंडल अध्यक्षों की घोषणा जिलाध्यक्ष और विधायक की सहमति से ही हुई थी। विवाद बढ़ने पर जिलाध्यक्ष रतन गाडरी को दिल्ली तलब किया गया। बताया जा रहा है कि उन्हीं के भेजे गए नाम पार्टी के लिए गले की फांस बन गए।
नियमों के अनुसार मंडल अध्यक्ष की उम्र 35 से 45 वर्ष के बीच होनी चाहिए, लेकिन आरोप है कि नियुक्तियों में इस नियम को भी दरकिनार कर दिया गया।
नवनियुक्त पदाधिकारी पर आपराधिक मामलों के आरोप
मामला यहीं नहीं रुका। भदेसर मंडल अध्यक्ष पर आपराधिक मामलों से जुड़े होने के आरोप सामने आए हैं, जिन्हें जिलाध्यक्ष का करीबी बताया जा रहा है। इसके अलावा कुछ नवनियुक्त अध्यक्षों के पहले पार्टी से निष्कासित रहने की बात भी सामने आई है, जो भाजपा के संगठनात्मक सिद्धांतों के खिलाफ मानी जा रही है।
इस मुद्दे पर हुई बैठकों में पूर्व जिलाध्यक्ष मिट्ठूलाल जाट, बांसवाड़ा प्रभारी कमलेश पुरोहित, महामंत्री रघु शर्मा, हर्षवर्धन सिंह सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल रहे। वहीं सागर सोनी, गोपाल चौबे और रणजीत सिंह भाटी जैसे नेताओं ने भी नियुक्तियों पर कड़ा ऐतराज जताया।
जिलाध्यक्ष की चुप्पी ने बढ़ाया सस्पेंस
जब इस पूरे विवाद पर भाजपा जिलाध्यक्ष रतन गाडरी से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, तो उन्होंने किसी कार्यक्रम में व्यस्त होने का हवाला देकर सवालों को टाल दिया।
सूत्रों के अनुसार चित्तौड़गढ़, बस्सी और घोसुंडा मंडल अध्यक्ष विधायक समर्थक माने जा रहे हैं, जबकि भदेसर मंडल अध्यक्ष को भाजपा जिलाध्यक्ष के करीबी के रूप में देखा जा रहा है।
क्या थमेगा बवाल या बढ़ेगी दरार?
चित्तौड़गढ़ बीजेपी में जारी यह सियासी खींचतान अब सिर्फ संगठनात्मक मुद्दा नहीं रही, बल्कि नेतृत्व और संतुलन की परीक्षा बन चुकी है। सवाल यही है—क्या प्रदेश नेतृत्व समय रहते दखल देगा या यह विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा रूप लेगा?




































































