18 साल बाद अजमेर शरीफ विस्फोट केस में नया मोड़, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को दिया अहम निर्देश

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Rajasthan High Court

Rajasthan High Court: 2007 के अजमेर शरीफ दरगाह विस्फोट में मारे गए और घायल हुए लोगों के लिए इंसाफ की उम्मीद एक बार फिर जगी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह (Rajasthan High Court)पीड़ित की अपीलों को देरी के आधार पर खारिज न करे, बल्कि मामले के गुण-दोष (मेरिट) के आधार पर फैसला सुनाए।

पीड़ित की आवाज को मिली सुनवाई

जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश अजमेर शरीफ के खादिम और शिकायतकर्ता सैयद सरवर चिश्ती की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। कोर्ट का यह रुख उन पीड़ितों के लिए राहत माना जा रहा है, जो वर्षों से न्याय की राह देख रहे हैं।

याचिकाकर्ता ने उन सात आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी, जिन्हें 2017 में एनआईए की विशेष अदालत ने दोषमुक्त कर दिया था। इसके साथ ही उन्होंने दो दोषी करार दिए गए आरोपियों को मिली सजा पर भी सवाल उठाए थे। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि उपयुक्त आवेदन दाखिल किया जाता है, तो हाईकोर्ट को पहले खारिज की गई अपीलों पर भी दोबारा सुनवाई करनी चाहिए और देरी को नजरअंदाज करते हुए मेरिट पर फैसला करना चाहिए।

रमजान की शाम, दरगाह में धमाका

यह मामला 11 अक्टूबर 2007 का है, जब रमजान के महीने में इफ्तार के तुरंत बाद अजमेर शरीफ दरगाह परिसर में बम विस्फोट हुआ था। उस वक्त दरगाह में भारी भीड़ थी। इस आतंकी हमले में तीन लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंपी गई थी। 2017 में एनआईए की विशेष अदालत ने भवेश पटेल और देवेंद्र गुप्ता को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जबकि सात अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया था।

90 दिन की देरी बनी थी दीवार

सैयद सरवर चिश्ती ने इन फैसलों के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की थी, लेकिन 2022 में हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा था कि नियमों के अनुसार 90 दिनों की समय-सीमा के बाद दायर अपीलों में देरी माफ नहीं की जा सकती, जैसा कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम, 2008 की धारा 21(5) में प्रावधान है।

अब मेरिट पर होगा फैसला?

सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद यह उम्मीद जगी है कि अब तकनीकी अड़चनों से ऊपर उठकर न्याय के मूल प्रश्न पर विचार किया जाएगा। यह मामला केवल कानूनी प्रक्रिया का नहीं, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा और भरोसे से जुड़ा है, जो 18 साल बाद भी इंसाफ की आस लगाए बैठे हैं। अब नजरें राजस्थान हाईकोर्ट पर टिकी हैं, जहां तय होगा कि अजमेर शरीफ विस्फोट मामले में न्याय की यह लड़ाई किस दिशा में आगे बढ़ती है।

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