तमिलनाडु में हिंदी को लेकर फिर गरमाई राजनीति, स्टालिन ने क्यों कहा “कभी जगह नहीं होगी

4
NEP 2020

NEP 2020: चेन्नई। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) अध्यक्ष एमके स्टालिन ने ‘भाषा शहीद दिवस’ के मौके पर केंद्र सरकार को दो टूक संदेश देते हुए एक बार फिर साफ कर दिया कि राज्य में हिंदी थोपने की किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा। 1960 के दशक के हिंदी-विरोधी आंदोलन के शहीदों को याद करते हुए स्टालिन ने कहा कि तमिलनाडु अपनी ( NEP 2020) भाषाई पहचान की रक्षा के लिए हमेशा अडिग रहा है और रहेगा।

“न तब जगह थी, न अब है, न कभी होगी”

मुख्यमंत्री स्टालिन ने सोशल मीडिया पर एक भावनात्मक पोस्ट साझा करते हुए लिखा, “भाषा शहीद दिवस के अवसर पर मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि तमिलनाडु में हिंदी के लिए न तब कोई जगह थी, न अब है और न कभी होगी।”
इस पोस्ट के साथ उन्होंने एक वीडियो भी साझा किया, जिसमें 1965 के ऐतिहासिक हिंदी-विरोधी आंदोलन के दृश्य दिखाए गए हैं। वीडियो में DMK के संस्थापक नेताओं सी.एन. अन्नादुरई और एम. करुणानिधि की भूमिका को भी रेखांकित किया गया है।

शहीदों को श्रद्धांजलि, स्मारक पर प्रतिमाओं का अनावरण

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने चेन्नई में ‘भाषा शहीद’ थलामुथु और नटरासन के स्मारक पर पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की। साथ ही उन्होंने चेन्नई महानगर विकास प्राधिकरण (CMDA) भवन पर इन दोनों शहीदों की प्रतिमाओं का अनावरण किया।

स्टालिन ने कहा कि तमिलनाडु ने न सिर्फ अपने लिए, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक समूहों की पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए ऐतिहासिक नेतृत्व किया है।

क्या है ‘भाषा शहीद दिवस’ का इतिहास?

‘भाषा शहीद’ शब्द उन आंदोलनकारियों के लिए प्रयोग किया जाता है जिन्होंने 1964-65 के दौरान हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाए जाने के विरोध में अपनी जान गंवाई थी। उस दौर में कई युवाओं ने हिंदी थोपे जाने के खिलाफ आत्मदाह तक कर लिया था।
इन्हीं घटनाओं के बाद तमिलनाडु में दो-भाषा सूत्र को मजबूती मिली, जिसमें तमिल और अंग्रेजी को ही प्राथमिकता दी जाती है।

NEP 2020 पर केंद्र से टकराव

DMK सरकार लगातार राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का विरोध करती आ रही है। मुख्यमंत्री स्टालिन का आरोप है कि केंद्र सरकार इस नीति के जरिए पिछले दरवाजे से हिंदी को गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर थोपना चाहती है।

स्टालिन ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हम अपनी भाषा से अपने जीवन की तरह प्रेम करते हैं। जब-जब इसे दबाने की कोशिश होगी, हमारा विरोध उतना ही तीव्र होगा।”

भाषा बनाम राजनीति नहीं, पहचान का सवाल

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा केवल भाषा का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता और संघीय ढांचे से जुड़ा है। तमिलनाडु में भाषा आंदोलन हमेशा से भावनाओं से जुड़ा रहा है और DMK इसे अपनी वैचारिक विरासत का मूल आधार मानती है।

भाषा शहीद दिवस पर स्टालिन का यह बयान साफ संकेत देता है कि आने वाले समय में भाषा और शिक्षा नीति को लेकर केंद्र और तमिलनाडु के बीच टकराव और तेज हो सकता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here