दरअसल, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जस्टिस यशवंत वर्मा को न्यायाधीश पद से हटाने के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ जांच समिति गठित करने की मंजूरी दी थी। इसी फैसले को जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सोमवार को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। आज अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा उठाया गया कदम संविधान और संसदीय प्रक्रिया के दायरे में है। इसके साथ ही जस्टिस वर्मा की याचिका खारिज कर दी गई।
क्या दलील दी थी जस्टिस वर्मा ने?
जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि किसी भी जज को पद से हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है। उन्होंने कहा था कि फिलहाल यह प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही स्वीकार हुआ है और राज्यसभा से अभी मंजूरी नहीं मिली है।
उनका यह भी कहना था कि सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष को जांच समिति बनाने का अधिकार नहीं है और यह कदम कानून के खिलाफ है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
जानिए क्या हैं कैशकांड
जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम मार्च 2025 में सामने आए चर्चित कैशकांड से जुड़ा है। उस समय वे दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायाधीश के पद पर तैनात थे। उनके सरकारी आवास में अचानक आग लग गई थी।
आग बुझाने के दौरान फायर ब्रिगेड को घर से अधजले नोटों की गड्डियां मिली थीं, जिनका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ था। बताया गया था कि आग लगने के समय जस्टिस वर्मा घर पर मौजूद नहीं थे, लेकिन इस घटना ने न्यायपालिका की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
इलाहाबाद ट्रांसफर के बाद तेज हुई कार्रवाई
कैशकांड सामने आने के बाद जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया था। इसके बाद से ही उनके खिलाफ पद से हटाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि जांच समिति अपना काम जारी रख सकेगी और जस्टिस वर्मा की मुश्किलें आने वाले दिनों में और बढ़ सकती हैं।
न्यायपालिका पर टिकी देश की नजर
यह मामला केवल एक जज तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को एक अहम संदेश के तौर पर देखा जा रहा है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
