जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में कैलाश सत्यार्थी ने बताया करुणा क्यों जरूरी है, राजनीति और मीडिया में भी लागू

JLF 2026

JLF 2026: जयपुर। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी अपनी नई किताब ‘करुणा’ पर चर्चा के लिए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) पहुंचे, जहां उन्होंने समाज, न्यायपालिका, राजनीति और वैश्विक हालात पर बेबाक राय रखी। सत्यार्थी ने कहा कि आज के समय में करुणा केवल एक भावना नहीं, बल्कि सामाजिक अस्तित्व की जरूरत बन चुकी है।

आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के सवाल पर कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि करुणा हम सभी के भीतर मौजूद है, लेकिन हम उसे सीमित कर देते हैं। (JLF 2026) उन्होंने स्पष्ट किया कि करुणा केवल इंसानों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि सभी जीवों के लिए होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “अगर हम खुद को संवेदनशील मानते हैं, तो यह संवेदना हर जीवन के लिए होनी चाहिए।”

करुणामई न्यायपालिका और राजनीति की जरूरत

कैलाश सत्यार्थी ने समाज में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और आक्रामकता पर चिंता जताते हुए कहा कि आज करुणामई न्यायपालिका, राजनीति और मीडिया की सख्त जरूरत है।

उन्होंने कहा, “हम सब करुणा के साथ पैदा होते हैं, लेकिन आक्रामक प्रतिस्पर्धा हमें असंवेदनशील बना देती है। मैं एक ‘कंपैशन ज्यूडिशियरी’ की बात करता हूं, जहां फैसलों में इंसानियत की झलक हो।”

सत्यार्थी ने कॉर्पोरेट दुनिया को भी आईना दिखाते हुए कहा कि सिर्फ मुनाफा नहीं, करुणामई लीडरशिप ही भविष्य की राह है।उन्होंने कहा कि जब तक कंपनियों के नेतृत्व में संवेदनशीलता नहीं होगी, तब तक समाज में असंतुलन बना रहेगा।

बांग्लादेश पर चिंता, “बाहरी ताकतें भी सक्रिय”

बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति पर बोलते हुए कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि वहां जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ आंतरिक मामला नहीं है।

उन्होंने कहा, “बांग्लादेश अकेला देश नहीं है। वहां की स्थिति समाज, इंसानों और इकॉनमी के लिए भी ठीक नहीं है। इसमें कुछ बाहरी ताकतें भी काम कर रही हैं।”

सिर्फ मोहम्मद यूनुस पर निर्भर नहीं सब कुछ

नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस का जिक्र करते हुए सत्यार्थी ने कहा कि पूरे देश की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति पर नहीं डाली जा सकती।उन्होंने कहा, “समाधान सामूहिक करुणा, जिम्मेदारी और वैश्विक समझ से ही निकलेगा।”अपनी किताब ‘करुणा’ के जरिए कैलाश सत्यार्थी समाज को यह याद दिलाना चाहते हैं कि तकनीक, ताकत और विकास के दौर में मानवीय संवेदना सबसे बड़ी शक्ति है। JLF के मंच से उनका संदेश साफ था—करुणा के बिना कोई भी समाज टिकाऊ नहीं हो सकता।

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