रेलवे की वर्दी से हटेगा अंग्रेजों का काला कोट, आगे और परंपराओं पर भी चल सकती है कैंची

Railway Uniform Change

Railway Uniform Change: नई दिल्ली। देश की परिवहन व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली भारतीय रेलवे अब एक और बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है। इस बार बदलाव ट्रेनों या स्टेशनों तक सीमित नहीं है, बल्कि रेल कर्मचारियों की वर्दी से जुड़ा है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने  बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि रेलवे में अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही काली बंदगले कोट की परंपरा अब समाप्त की जाएगी।

रेल मंत्री ने स्पष्ट कहा कि आज़ाद भारत में गुलामी के प्रतीकों को (Railway Uniform Change) ढोने का कोई औचित्य नहीं है और समय आ गया है कि ऐसी हर निशानी को हटाया जाए, जो औपनिवेशिक सोच की याद दिलाती हो।

‘गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलना जरूरी’

एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अश्विनी वैष्णव ने कहा कि बदलाव केवल व्यवस्था में नहीं, बल्कि सोच में भी होना चाहिए। उन्होंने कहा, “हमें अपनी मानसिकता से भी गुलामी के दौर की छाप हटानी होगी। यह सिर्फ काम करने के तरीकों तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे पहनावे और औपचारिक परंपराओं में भी बदलाव जरूरी है।”

रेल मंत्री ने साफ किया कि रेलवे कर्मचारियों द्वारा पहना जाने वाला बंदगले का काला सूट, जिसे ब्रिटिश शासनकाल में लागू किया गया था, अब रेलवे की औपचारिक वर्दी का हिस्सा नहीं रहेगा।

सिर्फ रेलवे तक सीमित नहीं है यह बदलाव

सरकार का यह कदम केवल रेलवे तक सीमित नहीं है। सरकारी स्तर पर उन सभी परंपराओं की पहचान की जा रही है, जो ब्रिटिश शासन के समय से चली आ रही हैं और जिनका आज के भारत से कोई सीधा संबंध नहीं है।

इनमें विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में दीक्षांत समारोहों के दौरान पहने जाने वाले गाउन और टोपी भी शामिल हैं। इसके अलावा कई औपचारिक अवसरों पर अधिकारियों द्वारा पहना जाने वाला बंदगले का कोट भी समीक्षा के दायरे में है।

कुछ राज्यों में आज भी कलेक्टरों, मेयरों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ काम करने वाले कर्मचारियों के लिए विशेष वर्दी तय है, जिसकी जड़ें औपनिवेशिक व्यवस्था से जुड़ी मानी जाती हैं।

प्रधानमंत्री के निर्देश पर हो रही समीक्षा

सरकारी सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे ऐसी पुरानी परंपराओं की पहचान करें और उनके स्थान पर भारतीय संस्कृति और स्थानीय परंपराओं को दर्शाने वाले विकल्प सुझाएं।

हालांकि कई विश्वविद्यालयों में दीक्षांत समारोहों से गाउन और टोपी की परंपरा खत्म हो चुकी है, लेकिन कुछ संस्थान अब भी इसका पालन कर रहे हैं। छात्रों और शिक्षकों का कहना है कि यह पहनावा न तो भारतीय जलवायु के अनुकूल है और न ही आधुनिक भारत की पहचान को दर्शाता है।

काले कोट और गाउन पर भी हो सकता है विचार

अधिकारियों का मानना है कि अभी कई ऐसी परंपराएं हैं, जिन पर आमतौर पर चर्चा नहीं होती, लेकिन आने वाले समय में उन पर भी विचार किया जा सकता है। सूत्रों के अनुसार, वकीलों द्वारा पहने जाने वाले काले कोट और गाउन पर भी भविष्य में चर्चा संभव है। यह पहनावा एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत निर्धारित है, जो काफी हद तक ब्रिटिश कानूनी व्यवस्था से लिया गया था। उस दौर में इसे अधिकार, गरिमा और न्याय का प्रतीक माना जाता था, लेकिन बदलते समय के साथ इसकी प्रासंगिकता पर अब सवाल उठने लगे हैं। रेलवे की वर्दी से शुरू हुआ यह बदलाव आने वाले समय में सरकारी कामकाज और परंपराओं की तस्वीर को नई पहचान दे सकता है।

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