Labour Code India: राज्य व केंद्र की नई लेबर कोड सुधारों पर सियासी और संगठित प्रतिवाद तेज—कांग्रेस और मजदूर संगठनों ने संशोधनों को श्रमिक-विरोधी करार दिया।
मजदूरों की असल मांगें अनसुनी
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि यह बदलाव किसी क्रांतिकारी सुधार की तरह नहीं है, बल्कि मजदूरों की मूल मांगों से दूर है। जयराम ने सवाल उठाया कि क्या नया कोड मनरेगा में ₹400 की न्यूनतम मजदूरी, ‘राइट टू हेल्थ’ जैसी योजनाएँ, रोजगार गारंटी, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिये समग्र सोशल सिक्योरिटी और कॉन्ट्रैक्ट नौकरियों पर रोक जैसी महत्त्वपूर्ण मांगें सुनिश्चित कर पाएगा।
“सरकार को कर्नाटक और राजस्थान जैसी सफल गिग वर्कर रिफॉर्म से सीखना चाहिए, जिन्होंने मजदूरों के लिये बेहतर कानून बनाए।” — जयराम रमेश
सरकार ने क्या बदला — 29 कानूनों का 4 कोड में समेकन
केंद्र ने करीब 29 अलग-अलग श्रम कानूनों को चार व्यापक लेबर कोड में समेकित कर दिया है। सरकार का कहना है कि इन परिवर्तनों से कर्मचारियों को कई राहतें मिलेंगी, जिनमें शामिल हैं:
- एक साल की नौकरी पर ग्रेच्युटी का प्रावधान
- ओवरटाइम पर दोगुनी सैलरी नियम
- महिलाओं के लिये समान वेतन की गारंटी
- नियमित स्वास्थ्य चेकअप और कुछ सामाजिक सुरक्षा लाभ
मजदूर संगठनों की मुख्य आपत्तियाँ
कई मजदूर संगठन इस कोड का विरोध कर रहे हैं और उनका कहना है कि नए प्रावधान मालिकों के पक्ष में शक्तियाँ बढ़ाते हैं। विरोध के पीछे प्रमुख चिंताएँ ये हैं:
- नौकरी की सुरक्षा कमजोर होना और नियोक्ता को कर्मचारियों को हटाने की अधिक छूट मिलना
- फिक्स्ड टर्म जॉब मॉडल से अस्थायीपन और अनिश्चितता बढ़ने का जोखिम
- संघटित हड़ताल और श्रमिक प्रतिरोध करने की क्षमता पर पाबंदी जैसे प्रावधान
- लॉजिस्टिक्स और ठेकेदारी व्यवस्था के कारण असंगठित श्रमिकों की सुरक्षा में गिरावट
- रात की शिफ्ट में महिलाओं के लिये सुरक्षा और कार्य-शर्तों के संरक्षण पर पर्याप्त प्रावधान न होना
कौन संगठनों ने विरोध बुलाया
रिपोर्टों के मुताबिक प्रमुख श्रमिक संगठन जैसे INTUC, AITUC, CITU और अन्य संगठनों ने 26 नवंबर को देशव्यापी विरोध का एलान किया है। इन संगठनों का कहना है कि नया कोड वास्तव में श्रमिकों के हित में नहीं, बल्कि नियोक्ता पक्ष को अधिक अधिकार देने वाला है।
सरकारी तर्क और आलोचना के बीच संतुलन
सरकार यह तर्क देती है कि कोड से औचित्यपूर्ण, पारदर्शी और आधुनिक श्रम नीतियाँ लागू होंगी, जिससे आर्थिक उत्पादकता और निवेश आकर्षण बढ़ेगा। विरोध करने वाले तब कहते हैं कि इन्हीं सुधारों के बहाने श्रमिक सुरक्षा कमजोर की जा रही है और अस्थायी रोजगार को संस्थागत स्वरूप दिया जा रहा है।
देशव्यापी प्रदर्शन और विपक्षी हमलों के बावजूद कोड की आधिकारिक प्रक्रियाएँ जारी हैं। अब देखना यह होगा कि सरकार किन किन प्रावधानों में संशोधन करने पर तैयार होती है, तथा श्रमिक संगठनों की मांगों और सामाजिक सुरक्षा के मामलों पर क्या समन्वय संभव होता है।
