Jaipur WTP Land Dispute: जयपुर के वर्ल्ड ट्रेड पार्क (WTP) के सामने स्थित करीब ₹1000 करोड़ मूल्य की सरकारी जमीन एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। आरोप है कि इस बेशकीमती जमीन पर कब्जा जमाने के लिए सुनियोजित तरीके से पूरा तंत्र सक्रिय किया गया। (Jaipur WTP Land Dispute)मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन इस जमीन को निजी हाथों में सौंपने की कथित कोशिशों ने प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
सरकार का बड़ा कदम, RAS बलवंत सिंह लिग्री निलंबित
मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने जेडीए के तत्कालीन जोन उपायुक्त एवं RAS अधिकारी बलवंत सिंह लिग्री को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। वहीं, राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने लगातार दो दिन तक मैराथन सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई को होगी।
तबादले से पहले खेल? विवादित मध्यस्थता ने खड़े किए सवाल
जांच में सामने आया कि वर्ष 2023 में तबादला आदेश जारी होने के बाद पद छोड़ने से ठीक पहले तत्कालीन जोन उपायुक्त बलवंत सिंह लिग्री ने अदालत में एक मध्यस्थता प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
आरोप है कि राज्य सरकार की पूर्व अनुमति और जेडीए आयुक्त की लिखित मंजूरी के बिना उन्होंने लगभग 17 हजार वर्गगज जमीन ग्रीन फायर प्रा. लि. तथा करीब 6,200 वर्गगज जमीन रतन प्रभा जैन एवं अन्य के नाम करने पर सहमति दर्ज कर दी।
कोर्ट को क्या गलत जानकारी दी गई?
सबसे गंभीर आरोप यह है कि अदालत के समक्ष यह दर्शाया गया कि इस प्रस्ताव को जेडीए आयुक्त की मंजूरी प्राप्त है। लेकिन जांच के दौरान ऐसा कोई अधिकृत अनुमोदन रिकॉर्ड पर नहीं मिला।
इसी कथित सहमति के आधार पर 9 सितंबर 2023 को लोक अदालत के जरिए वर्ष 2015 का निरस्तीकरण आदेश पलट दिया गया। यही बिंदु अब पूरे विवाद का केंद्र बन चुका है।
क्या बिना राजनीतिक संरक्षण संभव था इतना बड़ा फैसला?
मामले को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। क्या कोई अधिकारी अकेले इतना बड़ा निर्णय ले सकता था? जांच और राजनीतिक चर्चाओं में यह प्रश्न लगातार सामने आ रहा है कि क्या इस पूरे घटनाक्रम के पीछे प्रभावशाली लोगों का समर्थन था?
इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इन्हीं बिंदुओं पर अब कानूनी और प्रशासनिक जांच का फोकस बना हुआ है।
राजनीतिक कनेक्शन पर भी चर्चा
चर्चा का एक बड़ा कारण यह भी है कि निलंबित अधिकारी बलवंत सिंह लिग्री वर्तमान सरकार में स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह के विशिष्ट सहायक (OSD/विशिष्ट सहायक) के रूप में करीब सवा दो वर्ष तक कार्य कर चुके हैं।
हालांकि, इस मामले में किसी भी मंत्री या राजनीतिक नेता के खिलाफ अब तक कोई आधिकारिक आरोप सिद्ध नहीं हुआ है और जांच जारी है।
2003 से शुरू हुआ विवाद, 2015 में रद्द हुआ आवंटन
यह पूरा मामला वर्ष 2003 में उस समय शुरू हुआ जब यह जमीन अपोलो ग्रीन फायर अस्पताल के नाम आवंटित की गई थी।
बाद में आवंटन की शर्तों के कथित उल्लंघन के चलते दिसंबर 2015 में जेडीए ने इसे निरस्त कर दिया। इसके बाद तत्कालीन सरकार के दौरान इस भूमि पर पार्क विकसित किया गया, ताकि सरकारी संपत्ति सुरक्षित रह सके।
जेडीए की जांच के बाद बढ़ी कार्रवाई
सूत्रों के अनुसार जेडीए आयुक्त ने इस पूरे मामले की विस्तृत जांच कर सरकार को रिपोर्ट भेजी। इसके बाद सरकार ने हाईकोर्ट में प्रभावी पैरवी के लिए महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद को जिम्मेदारी सौंपी। वहीं, निलंबित अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई और आरोप-पत्र (चार्जशीट) तैयार करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।
अब सभी की नजर 20 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर है। अदालत का फैसला यह तय करेगा कि विवादित जमीन का भविष्य क्या होगा। यदि अनियमितताओं के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला राजस्थान के सबसे चर्चित भूमि विवादों में शामिल हो सकता है।
