समस्या पुतिन नहीं, समस्या प्रतिनिधित्व की गिरावट है
इंटरव्यू में दिखा देहभाषा का ढीलापन, स्वर की अधम्यता और सांस्कृतिक गरिमा की कमी — ये पुतिन के व्यक्तित्व से जुड़े मुद्दे नहीं हैं। यह उस गिरावट का संकेत है जो हमने अपनी सभ्यता के प्रतिनिधित्व में देखा। जब हमारे संवाददाता विनम्रता और मर्यादा छोड़ देते हैं, तो केवल एक चैनल की छवि नहीं बल्कि पूरे देश की छवि प्रभावित होती है।
पत्रकारिता: अहंकार नहीं — ज़िम्मेदारी
पत्रकारिता को स्टाइल, TRP और व्यक्तिगत ब्रांडिंग से ऊपर उठकर देखना होगा। बैठने का ढंग, शरीर की भाषा और बाणी — ये मामूली नहीं; ये संकेत हैं कि हम किस तरह की परिपक्वता और सभ्यता दिखाना चाहते हैं। जब किसी राष्ट्राध्यक्ष के सामने बैठना हो, तो यह अवसर भारत के आदर्शों का प्रदर्शन होना चाहिए — न कि नकल या दिखावा।
दोहरा मापदंड और सार्वजनिक सवाल
एक ओर संसद में आंख मारने के लिए तत्काल सांस्कृतिक निंदा होती है, दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसी तरह के आचरण पर मौन क्यों? यह प्रश्न केवल चैनल की आलोचना नहीं है — यह राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रश्न है। क्या सभ्यता सिर्फ तब याद आती है जब निशाना घरेलू राजनीतिक व्यक्तित्व हों?
सनातनी मूल्यों का संदेश — शक्ति के साथ विनम्रता
सनातन ज्ञान के अनुसार, ज्ञान तभी प्रभावशाली होता है जब उसे विनम्रता से धारण किया जाए — “विनयेन दीप्यते ज्ञानम्।” यही वह सबक है जो इस मामले से निकलकर आता है: शक्ति बिना विनम्रता के सिर्फ अहंकार बन जाती है। मीडिया को यह समझना होगा कि आचरण ही असली संदेश है।
माफी सिर्फ कमजोरी नहीं — सुधार का संकेत
Aaj Tak और संबंधित पत्रकारों के लिए माफी माँगना केवल क्षमायाचना नहीं है — यह पेशेवर सुधार और जिम्मेदारी स्वीकार करने का जज़्बा होना चाहिए। रूस और भारत दोनों से, और सबसे बढ़कर अपने दर्शकों से माँगना चाहिए कि मीडिया अपने आचरण पर पुनर्विचार करे और सार्वजनिक मंचों पर सभ्यता की झलक बरकरार रखे।
वैश्विक संवाद में संस्कृति की अहमियत
यह मामला हमें याद दिलाता है कि सम्मान विकल्प नहीं है — यह सभ्यता है। जब भारत विश्वमंच पर बोलता है, तो उसकी आवाज़ निडर हो सकती है, पर आचरण हमेशा सनातनी, मर्यादित और जिम्मेदार होना चाहिए। मीडिया की यही असली ज़िम्मेदारी है — दर्शक का भरोसा और राष्ट्र का सम्मान बनाए रखना।



































































