China US Conflict: प्रशांत महासागर के दूर-दराज़ द्वीप एक बार फिर वैश्विक सैन्य रणनीति के केंद्र में आ गए हैं। अमेरिका उन हवाई अड्डों को दोबारा सक्रिय कर रहा है, जिनका इस्तेमाल करीब 70–80 साल पहले द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान किया गया था। वजह साफ है (China US Conflict)चीन के साथ बढ़ती सैन्य प्रतिस्पर्धा और ताइवान को लेकर संभावित टकराव की आशंका।
WWII की रणनीति, 21वीं सदी की जंग
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान के खिलाफ Island Hopping Strategy अपनाई थी। अब लगभग वही मॉडल चीन के संदर्भ में दोहराया जा रहा है। नए एयरबेस बनाना महंगा और समयसाध्य है, इसलिए पुराने WWII रनवे को अपग्रेड करना अमेरिका के लिए तेज़ और किफायती विकल्प बन गया है।
ACE रणनीति: भविष्य की हवाई जंग की रीढ़
इस पूरी योजना का आधार है Agile Combat Employment (ACE)। इसका उद्देश्य बड़े एयरबेस पर निर्भरता घटाना और लड़ाकू विमानों को छोटे, बिखरे हुए ठिकानों से ऑपरेट करना है। इससे दुश्मन के लिए सभी बेस को एक साथ निशाना बनाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। अमेरिकी वायुसेना के मुताबिक, आने वाले युद्धों में ACE निर्णायक भूमिका निभाएगी।
गुआम और ओकिनावा क्यों असुरक्षित हो गए?
हवाई से गुआम और ओकिनावा तक का पारंपरिक अमेरिकी एयर कॉरिडोर अब चीन की लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों की रेंज में है। पेंटागन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की Rocket Force के पास बड़ी संख्या में मिसाइलें हैं, जबकि इन अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल डिफेंस सीमित है। यही कारण है कि अमेरिका वैकल्पिक और बिखरे हुए एयरबेस तैयार कर रहा है।
ज्यादा एयरबेस, चीन के लिए ज्यादा चुनौती
अमेरिकी रणनीति सीधी है—अगर 5 एयरबेस होंगे तो उन्हें निशाना बनाना आसान होगा, लेकिन अगर 50 एयरबेस होंगे तो चीन को ज्यादा मिसाइलें, ज्यादा समय और ज्यादा संसाधन झोंकने पड़ेंगे। यह दबाव युद्ध के दौरान अमेरिका को रणनीतिक बढ़त देगा।
युद्ध से पहले ही युद्ध जैसी तैयारी
अमेरिका अब “Fight starts before war” की सोच पर काम कर रहा है। हथियारों की पहले से तैनाती, ईंधन भंडारण, मजबूत रनवे, और यहां तक कि 3D प्रिंटिंग से विमान मरम्मत की सुविधा भी तैयार की जा रही है ताकि युद्ध शुरू होते ही ऑपरेशन बाधित न हों।
नॉर्थ फील्ड: WWII का दैत्य फिर सक्रिय
उत्तरी मारियाना द्वीप के टिनियन द्वीप पर स्थित North Field इस रणनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है। 1945 में यह दुनिया का सबसे बड़ा एयरबेस था, जहां से जापान पर हमले हुए थे। करीब 80 साल बाद इसे फिर से आधुनिक तकनीक के साथ तैयार किया जा रहा है।
2027 क्यों है निर्णायक?
अमेरिकी अधिकारियों का आकलन है कि 2027 तक चीन ताइवान को लेकर सैन्य कदम उठा सकता है। इसी कारण North Field को 2027 तक पूरी तरह ऑपरेशनल बनाने का लक्ष्य रखा गया है। यहां F-35 जैसे 5th Gen फाइटर, भारी कार्गो विमान और मानवरहित लड़ाकू ड्रोन तैनात किए जा सकेंगे।
Second Island Chain पर मजबूत पकड़
गुआम का North West Field, टिनियन इंटरनेशनल एयरपोर्ट, Yap Island और Palau के WWII एयरस्ट्रिप—इन सभी को अपग्रेड किया जा रहा है। यहां रडार सिस्टम लगाए जाएंगे जो चीनी मिसाइलों को पहले ही ट्रैक कर सकें।
फिलीपींस और अलास्का की अहम भूमिका
फिलीपींस के Clark, Subic Bay, Basa और Mactan जैसे बेस फॉरवर्ड लॉन्च पैड के रूप में विकसित किए जा रहे हैं। वहीं अलास्का में Elmendorf और Eielson बेस को ACE नेटवर्क से जोड़ा गया है, जिससे चीन को उत्तर दिशा से घेरने की रणनीति मजबूत होगी।
जापान में भी तैयारी तेज
जापान के Atsugi और Yokota बेस पर युद्ध सामग्री पहले से स्टोर की जा रही है। RED HORSE और Seabees जैसी यूनिट्स रनवे और सपोर्ट सिस्टम को तेजी से मजबूत कर रही हैं।
चीन का जवाब और अमेरिका का पलटवार
बीजिंग ने आरोप लगाया है कि अमेरिका चीन खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है और एशिया-प्रशांत को युद्ध का मैदान बनाया जा रहा है। इस पर अमेरिका का कहना है—“तैयारी जितनी मजबूत होगी, युद्ध की संभावना उतनी कम होगी।”
स्पष्ट है कि प्रशांत महासागर में WWII की छाया एक बार फिर लौट रही है, लेकिन इस बार तकनीक, रणनीति और दांव कहीं ज्यादा बड़े हैं।
