Pachpadra Refinery: राजस्थान की पचपदरा रिफाइनरी में 20 अप्रैल को लगी आग ने एक बार फिर 80 हजार करोड़ रुपये की इस बहुचर्चित परियोजना को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इसे प्रदेश के विकास, रोजगार और औद्योगिक भविष्य का नया प्रतीक बताया जाता है, लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे एक ऐसी अनकही कहानी दबी है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं।
यह सिर्फ एक रिफाइनरी की कहानी नहीं, (Pachpadra Refinery)बल्कि 600 साल पुराने इतिहास, परंपरा और हजारों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ी उस विरासत की कहानी है, जो आधुनिक विकास की दौड़ में कहीं पीछे छूटती नजर आई। सवाल यह है कि क्या तरक्की की इस कीमत पर उस इतिहास को भुला दिया गया?
नमक से बनी पहचान, खारवाल समाज का आधार
पचपदरा के रण क्षेत्र में फैली करीब 32.34 वर्ग मील भूमि पर सदियों से नमक उत्पादन होता रहा है। यह सिर्फ कारोबार नहीं था, बल्कि खारवाल समाज की पहचान और जीवन का आधार था। ‘खारे’ नमक से ही इस समाज का नाम खारवाल पड़ा।
बताया जाता है कि 300-400 साल पहले यहां 1200 से अधिक नमक की खानें सक्रिय थीं। इनमें से 433 खानें सीधे खारवाल समाज की थीं। इन खानों से पचपदरा और आसपास के 40 किलोमीटर क्षेत्र में करीब 20 हजार लोगों की आजीविका चलती थी।
रिफाइनरी आई, नमक की खानें गईं
वर्ष 2013-14 में जब रिफाइनरी परियोजना को लीलाणा से पचपदरा शिफ्ट किया गया, तब इसके लिए 12 हजार 34 बीघा जमीन हस्तांतरित की गई।
इस विकास की सबसे बड़ी कीमत नमक उद्योग ने चुकाई। रिफाइनरी क्षेत्र में आने वाली 198 नमक की खानें खत्म कर दी गईं। इसके साथ ही हजारों परिवारों की रोजी-रोटी भी छिन गई।
उस समय प्रभावित लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए, लेकिन आज तक उन्हें आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं मिला।
“अब खान नहीं, ऑटो चलाकर घर चला रहे हैं”
खारवाल समाज के शैतान सिंह बताते हैं…हमारी खान नंबर 50 थी, जिससे हर साल 100-150 टन नमक निकलता था। खान चली गई तो अब ऑटो चलाकर परिवार पालना पड़ रहा है।” यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि पूरे समाज की पीड़ा है।
जब नमक से दौड़ती थी रेल
पचपदरा का नमक सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं था। इसकी गुणवत्ता इतनी अच्छी थी कि इसे बिना प्रोसेसिंग सीधे उपयोग किया जाता था। इसी व्यापार के कारण यहां रेलवे लाइन बिछाई गई थी। वर्ष 1932 में अंग्रेजों ने यहां रेल सेवा शुरू की थी। चार पैसेंजर कोच और बाकी डिब्बे नमक ढुलाई के लिए लगाए जाते थे। 1990 की बाढ़ में पटरी बह गई और रेल सेवा बंद हो गई। 1992 में पटरियां भी उखाड़ ली गईं। ब्रिटिश काल के रेलवे स्टेशन आज भी पचपदरा और सांभरा में मौजूद हैं।
आजादी की लड़ाई से भी जुड़ा है पचपदरा
वरिष्ठ पत्रकार गुलाब बत्रा बताते हैं कि पचपदरा का नमक स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ा रहा है। उनके अनुसार, महात्मा गांधी ने 1930 में दांडी पहुंचकर नमक कानून तोड़ा था, लेकिन पचपदरा में स्थानीय लोगों ने 1926 में ही ब्रिटिश नमक एकाधिकार के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया था। यह आंदोलन दांडी मार्च की प्रेरणा माना जाता है। पचपदरा सॉल्ट डिपो उस दौर में संघर्ष का केंद्र बना था।

नमक बनने की अनोखी परंपरा
कहा जाता है कि मेवाड़ रियासत के झांझा नामक अधिकारी यहां से गुजर रहे थे, तभी उन्होंने रेत में चमकते सफेद कण देखे। पानी चखने पर स्वाद खारा निकला और यहीं से नमक उत्पादन शुरू हुआ।
आज भी यहां पारंपरिक तरीके से नमक बनाया जाता है। स्थानीय लोग इसे आशापुरा माता का वरदान मानते हैं।
- पहले बारिश का पानी गड्ढों में जमा किया जाता है
- फिर ‘मुराली’ नामक पौधा उसमें डाला जाता है
- 10-11 महीनों में नमक तैयार होता है
महिलाएं नमक को पिरामिड आकार में जमा करती हैं, ताकि बारिश में नुकसान कम हो।
विकास बनाम विरासत का सवाल
पचपदरा का नमक उद्योग कभी इस इलाके की रीढ़ था। आज वहीं उद्योग खत्म होने के कगार पर है। एक तरफ आधुनिक रिफाइनरी परियोजना है, जो विकास और रोजगार के नए दावे करती है। दूसरी तरफ 600 साल पुरानी विरासत है, जो धीरे-धीरे मिट रही है। खारवाल समाज के लिए यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व का सवाल है। जिस नमक ने कभी उनकी जिंदगी में स्वाद घोला था, आज वही उनके आंसुओं की वजह बन गया है।