World News Hindi: नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय तक चली बातचीत के बाद आखिरकार व्यापार समझौते का ऐलान हो गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस डील की पुष्टि की, लेकिन अब इस समझौते के पीछे की एक दिलचस्प और सख्त कूटनीतिक कहानी सामने आई है.
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट ने इस डील के बैकग्राउंड में चल रही हाई-लेवल रणनीति का खुलासा किया है, जिसमें भारत ने साफ कर दिया था कि वह किसी भी (World News Hindi) अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर फैसले नहीं करेगा.
अमेरिका को साफ संदेश
ब्लूमबर्ग रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने बीते साल सितंबर में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से मुलाकात के दौरान बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया था.
डोभाल ने अमेरिकी पक्ष को यह संदेश दे दिया था कि अगर व्यापार समझौता नहीं होता है, तो भारत इसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के खत्म होने तक इंतजार करने को तैयार है.
उन्होंने साफ कहा था कि भारत पहले भी अमेरिका के शत्रुतापूर्ण प्रशासन का सामना कर चुका है और वह किसी भी तरह के दबाव में समझौता नहीं करेगा.
सार्वजनिक आलोचना कम करने की सलाह
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस मुलाकात के दौरान अजीत डोभाल ने अमेरिकी नेतृत्व से यह भी कहा था कि राष्ट्रपति ट्रंप और उनके सहयोगी भारत की सार्वजनिक आलोचना कम करें.
डोभाल का मानना था कि सार्वजनिक मंचों पर भारत के खिलाफ बयानबाजी से द्विपक्षीय रिश्तों में तनाव बढ़ता है और विश्वास की कमी पैदा होती है. उन्होंने कहा कि यदि संबंधों को फिर से पटरी पर लाना है, तो सार्वजनिक बयानबाजी की भाषा बदलनी होगी.
2029 तक इंतजार को तैयार था भारत
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने साफ तौर पर यह संकेत दिया था कि वह ट्रेड डील के लिए 2029 तक यानी डोनाल्ड ट्रंप के संभावित कार्यकाल के अंत तक इंतजार कर सकता है.
यह रुख भारत के बढ़ते आत्मविश्वास और मजबूत कूटनीतिक स्थिति को दर्शाता है, जहां नई दिल्ली अब बड़े वैश्विक साझेदारों के सामने भी अपनी शर्तों पर बातचीत करने को तैयार है.
आखिर क्यों बनी ट्रेड डील?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के इस सख्त लेकिन संतुलित रुख ने अमेरिका को भी यह समझा दिया कि दबाव की राजनीति से काम नहीं चलेगा. इसी के बाद दोनों देशों के बीच सहमति का रास्ता साफ हुआ और व्यापार समझौते की घोषणा संभव हो सकी.
यह डील सिर्फ व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि भारत की बदली हुई वैश्विक रणनीति और आत्मनिर्भर सोच का भी संकेत मानी जा रही है.
