भारत के महानगरों पर मंडराया संकट? रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता, जानिए क्या है खतरे की वजह

Delhi Mumbai Crisis

Delhi Mumbai Crisis: ग्लोबल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज रेटिंग्स ने भारत में गहराते जल संकट को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली चेतावनी जारी की है. मूडीज के मुताबिक, भारत की जल प्रबंधन व्यवस्था काफी बिखरी हुई है, जिसके कारण आने वाले समय में देश की आर्थिक रफ्तार और (Delhi Mumbai Crisis)करोड़ों लोगों की जिंदगी पर बड़ा संकट मंडरा सकता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न क्षेत्रों के बीच पानी के बंटवारे की सुस्त प्रक्रिया और चुनिंदा सेक्टर्स को मिलने वाली भारी सब्सिडी इस समस्या को और गंभीर बना रही है. इससे सरकारी खजाने पर भी राजकोषीय दबाव तेजी से बढ़ रहा है.

एआई (AI) उद्योगों के कारण भी पानी

भारत में उपलब्ध मीठे पानी का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा अकेले कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होता है, जहां पानी और बिजली पर मिलने वाली छूट से भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है. इसके अलावा, देश में तेजी से बढ़ रही डिजिटल अर्थव्यवस्था, जैसे डेटा सेंटर्स, क्लाउड कंप्यूटिंग और एआई (AI) उद्योगों के कारण भी पानी की खपत बहुत ज्यादा बढ़ गई है. इन हाई-टेक सेंटर्स में सर्वर्स को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है. ऐसे में सीमित संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है.

मुंबई में बचा एक महीने का पानी

देश के प्रमुख महानगरों में जल संकट अब धरातल पर दिखने लगा है. आर्थिक राजधानी मुंबई को पानी सप्लाई करने वाले सात प्रमुख जलाशयों में जल स्तर गिरकर महज 9.33 प्रतिशत रह गया है, जो सिर्फ एक महीने के लिए काफी है. देश की राजधानी दिल्ली में भी पानी का उत्पादन सामान्य से 50 एमजीडी कम हो चुका है, जिससे कई इलाकों में हफ्तों से पानी नहीं आ रहा है. वहीं, चेन्नई के जलाशयों में भले ही अभी 9-10 महीने का पानी सुरक्षित हो, लेकिन वहां तेजी से गिरता भूजल स्तर और बढ़ती औद्योगिक मांग भविष्य के लिए बड़ा खतरा है.

जल संकट का सीधा असर देश की वित्तीय

जल प्रबंधन का जिम्मा मुख्य रूप से राज्यों के पास होने से हर राज्य की नीतियां अलग हैं, जिससे संकट के समय पानी का सही पुनर्वितरण नहीं हो पाता है. पाइपलाइन नेटवर्क की कमियां, भीषण सूखा, बाढ़, अनियमित मानसून और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां इस समस्या को और ज्यादा हवा दे रही हैं. मूडीज ने साफ किया है कि जल संकट का सीधा असर देश की वित्तीय और आर्थिक स्थिरता पर पड़ेगा. इसलिए भारत को बढ़ती आबादी और औद्योगिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाने के लिए तुरंत एक दीर्घकालिक नीति अपनानी होगी.

 

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